शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग: एक आवश्यकता और चुनौती
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की नींव होती है और एक विकसित समाज की दिशा में यह सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। भारत में शिक्षा का महत्व अनमोल है, क्योंकि यह न केवल व्यक्तियों के जीवन को बेहतर बनाती है, बल्कि समग्र राष्ट्र की सामाजिक और आर्थिक प्रगति के लिए भी अनिवार्य है। लेकिन, हमारे देश की शिक्षा प्रणाली में कई समस्याएं और कमियां हैं, जो न केवल छात्रों की अकादमिक उपलब्धियों को प्रभावित करती हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी दीर्घकालिक समस्याएँ उत्पन्न कर सकती हैं। इसलिए, शिक्षा प्रणाली में सुधार की सख्त आवश्यकता है।
शिक्षा प्रणाली में सुधार की प्रमुख मांगें:
- पारंपरिक शिक्षा पद्धतियों में बदलाव: भारतीय शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा मुद्दा यह है कि यह अभी भी पारंपरिक और याद करने की प्रणाली पर आधारित है। छात्रों को केवल किताबों से जानकारी रटने और परीक्षा में उसे प्रस्तुत करने के लिए तैयार किया जाता है। इस प्रणाली में छात्रों की रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच, और व्यावहारिक ज्ञान को नजरअंदाज किया जाता है। इसलिए, शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम के बाहर जीवन की वास्तविक समस्याओं से जोड़ने की आवश्यकता है। एक प्रायोगिक और नवाचार आधारित शिक्षा प्रणाली छात्रों को उनकी सोच और कौशल के विकास में मदद कर सकती है।
- शिक्षकों की गुणवत्ता और प्रशिक्षण: शिक्षकों की गुणवत्ता में सुधार की भी सख्त आवश्यकता है। कई सरकारी स्कूलों में शिक्षक पर्याप्त प्रशिक्षण प्राप्त नहीं करते, और उनकी शिक्षा विधियां भी पुरानी हो चुकी हैं। शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए जरूरी है कि शिक्षकों को नियमित रूप से प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वे नई तकनीकों, शैक्षिक नीतियों और छात्रों की बदलती जरूरतों के अनुरूप अपने शिक्षण पद्धतियों को अपडेट कर सकें।
- इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार: भारत के कई दूरदराज के इलाकों में स्कूलों और कॉलेजों में उचित इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे शौचालय, पानी, और सुरक्षित परिसर छात्रों की शिक्षा पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इसके अलावा, कई सरकारी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षण सामग्री, पुस्तकालय, और खेल सुविधाएं नहीं हैं, जो छात्रों के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। शिक्षा के अधिकार के तहत सभी छात्रों को इन बुनियादी सुविधाओं का अधिकार मिलना चाहिए।
- नई और समग्र पाठ्यचर्या: वर्तमान शिक्षा प्रणाली में पाठ्यक्रम अधिकतर थ्योरी आधारित है, जो छात्रों को केवल परिभाषाओं और तथ्यों को याद करने पर जोर देता है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली में छात्रों को कौशल आधारित शिक्षा, जीवन कौशल, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, और समाजिक जिम्मेदारियों पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसके अलावा, पाठ्यक्रम में कला, संगीत, खेल, और अन्य सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों को भी अधिक महत्व दिया जाना चाहिए, ताकि छात्रों के बहुआयामी विकास को बढ़ावा मिल सके।
- डिजिटल शिक्षा का समावेश: कोरोना महामारी के बाद से डिजिटल शिक्षा का महत्व और बढ़ गया है। हालांकि, देश के विभिन्न हिस्सों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्याएं और डिजिटल संसाधनों का अभाव है, लेकिन फिर भी हमें डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए। ऑनलाइन शिक्षण विधियों को सुधारने और छात्रों को डिजिटल उपकरणों तक पहुंच देने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए। डिजिटल शिक्षा को छात्रों के लिए और अधिक सुलभ और प्रभावी बनाना समय की आवश्यकता है।
- परीक्षाओं का पुनः मूल्यांकन: भारतीय शिक्षा प्रणाली में परीक्षा का दबाव अत्यधिक है। छात्रों को एक निश्चित समय में अधिक से अधिक जानकारी रटने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। परीक्षा प्रणाली को ऐसे रूप में परिवर्तित किया जाना चाहिए, जो छात्र के समग्र विकास को मापे, जैसे कि उसके सोचने की क्षमता, रचनात्मकता, और समस्या सुलझाने की क्षमता। इसके अलावा, परीक्षा के तरीके को छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अधिक अनुकूल और लचीला बनाना चाहिए।
- शिक्षा में समानता और समावेशिता: भारत में शिक्षा में असमानता एक गंभीर समस्या है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में, जाति और आर्थिक स्थिति के आधार पर शिक्षा के अवसरों में बड़ा अंतर है। इसलिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सरकार समान शिक्षा प्रणाली विकसित करे, जिससे सभी बच्चों को समान अवसर मिल सकें। विशेषकर महिलाओं, अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों, और विकलांग बच्चों के लिए शिक्षा में समावेशिता और अवसरों की समानता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।
